गुरु शिष्य परंपरा : गुरु और शिष्य का संबंध

हमारे देश में अनादिकाल से कहा जाता है कि गुरु और गोविंद दोनों एक साथ हैं तो पहले किसे प्रणाम किया जाना चाहिए, जवाब है पहले गुरु को प्रणाम करो जिन्होंने गोविंद अर्थात भगवान से परिचय करवाया है। इसका अर्थ यह है कि गुरु की महिमा भगवान से भी बढ़कर होती है। लोग अपने स्वार्थ में डूब कर गुरु से भी धोखा करने में चुभते। अभी इस तरह के मनुष्य हैं जो गुरु से ज्ञान लिया अपने जीवन का काम बना लिया। फिर जब कोई प्रीत की तार कहीं जुड़ गई कोई स्वार्थ सामने आ गया या कोई निजी हित की बात आ गई तो गुरु को दरकिनार कर लिया। यह क्या रिश्ता हुआ यह तो किसी और को नहीं स्वयं को ही धोखा देना हो गया। मुझे ऐसी बातों पर फिर भी कभी आश्चर्य नहीं होता, मैं क्या हर गुरु ऐसा ही करेगा इसलिए क्योंकि गुरु की प्रीति में भी नीति होती है। गुरु तो क्षमा के सागर होते हैं तब ही तो गुरु हो पाते हैं इस बात को स्वार्थ में डूबे लोग शायद कभी समझ नहीं पाते हैं।

एक उदाहरण देता हूं किसी ने कहा यह मेरा भाई है, मेरा अपना खून है, हम एक मां के जाए हैं, हम दोनों की रगों में एक ही खून दौड़ रहा है इसलिए मेरी इससे प्रीति है मैं इसके विरुद्ध नहीं जा सकता। मुझे तो इस का पक्ष लेना ही पड़ेगा क्योंकि अपने भाई के विरुद्ध जाऊंगा तो लोग क्या कहेंगे। लोग का इतना लिहाज तो रखना ही पड़ेगा वह एक उदाहरण है। अब दूसरा उदाहरण यही देख लीजिए किसी ने कहा यह मेरा भाई तो है, लेकिन सदा मेरे खिलाफ रहा है। घर परिवार में मेरे विरुद्ध खड़े अंत रास्ता है इसके रचे खन तों के कारण ही मुझे खरी-खोटी सुननी पड़ी। घर छोड़ देना पड़ा मेरी इससे कोई प्रीत नहीं है, मैं इसका साथ नहीं दे सकता हूं। दुनिया में ऐसा तो होता ही है, मैं दुनिया से अलग चलूंगा तो लोग क्या कहेंगे। इसलिए मैं इसके विरुद्ध ही रहूंगा। कितनी मजेदार बात है कि दोनों ही लोग दुनियादारी का हवाला देते हैं। और अलग-अलग ढंग से सोचते हैं, सोचते ही नहीं हैं बिल्कुल भिन्न व्यवहार भी करते हैं। दोनों की सोच की धाराएं दुनियादारी के मामले में भिन्न है फिर भी दोनों दुनिया का ही संदर्भ देते हैं। इसका अर्थ है कि सभी को दुनिया की ही चिंता लगी हुई है।

किसी विद्वान कवि की बात मुझे याद आती है, जिन्होंने महज 2 पंक्तियों में इस दुनियादारी का सार व्यक्त कर दिया है। इन दो पंक्तियों को देख लीजिए, “सबसे बड़ा रोग क्या कहेंगे लोग” यही दुनिया है जिसमें हम सभी रहते हैं। यहां लोगों को चिंता यह है कि लोग क्या कहेंगे, यह चिंता नहीं है कि प्रीति क्या है, ईश्वर का न्याय क्या है। कोई रिश्ता नहीं जहां अपना स्वार्थ आड़े आता हो दुनियादारी की रीत को तो इन्होंने अपना हित साधने का माध्यम बना दिया है। इस उदाहरण को थोड़ा और गहराई से समझने का प्रयास करते हैं। न्याय करना है नीति पर चलना है लेकिन रिश्ता तो निभाना ही पड़ेगा इसलिए निभाना पड़ेगा कि भाई से प्रीति है वह गलत है तब भी उसके साथ है फिर तो रिश्ता निभा लीजिए और अन्याय करते रहिए यह तो कोई बात नहीं हुई लेकिन इस सकल संसार में अक्सर लोग ऐसा ही करते हैं उन्हें दुनियादारी जो निभानी है अब उसे उदाहरण भी गहराई से समझने भाई है लेकिन उससे प्रीत नहीं है व्यक्तिगत रूप से अपने भाई के विरुद्ध है इसलिए वह सही है तब भी उसका साथ नहीं देगा कमाल है कि वह कहता है ऐसा तो दुनिया में होता ही है यह निभाना पड़ेगा क्योंकि नहीं निभाया

तो लोग कहेंगे यह मूर्ख है जो अपने खड़े अंत कारी भाई के साथ खड़ा है उसका साथ दे रहा है मूर्ख कौन है और समझदार कौन है यह फैसला भी लोग अपने हितों को देखकर करते हैं बिना पेंदे के लोटे आपने देखे होंगे किसी भी तरह लुढ़क जाते हैं जिधर ढाल होती है उधर झुक जाते हैं वह प्रीति को ढाल मान लेते हैं तो कभी भी देश को क्या ऐसे लोग किसी भी तरह से समझदार कहा जा सकता है मतलब यह कि लोग प्रीत के अनुसार चलते हैं नीच को दरकिनार कर देते हैं कहीं पर सच बोलना है लेकिन ऐसा करने से पहले 20 बार सोचते हैं यह अनित के पथ पर चलना ही तो हुआ यह अन्याय करना एक पाप है जिसकी सजा मिलती है आध्यात्म की भाषा में इसे करो बंधन कहते हैं कर्म बंध के झंझट में लोग बहुत सारा भार अपने कंधों पर ढोते हुए जीते रहते हैं उन्हें पता नहीं है कैसे करूं बंधुओं का चारा करने के लिए ही मनुष्य को बार-बार जन्म लेना पड़ता है ऐसे करो बंधुओं का चुका होगा तभी उस व्यक्ति की मुक्ति हो सकेगी इसमें कोई संशय नहीं है इसलिए मैं कई बार ऐसे संतो साधकों और संसार में ज्ञान बांटने वालों तपस्या कवियों के उदाहरण देता हूं जैसे संत कबीर रैदास सूरदास गोस्वामी तुलसीदास जी ने जो कुछ कहा वह शब्द अमर हो गए ऐसे सभी संतो कवियों के मुख से जो भी निकला हुआ दुनिया के लिए उजाला हो गया ऐसे ही महान संतों को दुनिया याद करती आई है आज भी कर रही है तथा सदैव स्मरण करती रहेगी संत कबीर ने तो प्रेम के ढाई आखर पढ़ने वाले को पंडित प्रेम में लोक की प्रीत नहीं है इस पांडित्य में जाति का बोध भी नहीं है कबीर ने जिसे पंडित कहा वह किसी ब्राह्मण कुल में जन्मे व्यक्ति नहीं था वह तो ज्ञान के आलोक से परिपूर्ण व्यक्तित्व था जिसके कृतित्व ने उसे पंडित बना दिया इस तरह से ऐसे व्यक्ति ने संसार में जन्म लेकर अपना जीवन सफल बना दिया बात मनुष्य की मूर्खता की चल रही थी कौन मूर्ख कौन समझदार इसमें हमारे प्राचीन शास्त्रों में स्पष्ट उल्लेख मिलता है किस व्यवहार से मनुष्य मूर्ख कहलाता है और किस चिंतन सेवा ज्ञानी हो जाता है नीतिगत ज्ञान में बहुत विस्तार से समझाया गया है लेकिन हम सभी इसे समझें तभी उस ज्ञान के आलोक का कोई अंश प्राप्त कर सकते हैं जय श्री राम

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