परम पवित्र माघ मास का प्रारंभ 10 जनवरी, रविवार से हो रहा है और समाप्ति माघ पूर्णिमा, , शनिवार 27 फरवरी को होगा ।

माघ स्नान 10 जनवरी, शुक्रवार, पूर्णिमा से शुरू होगा ।

हिंदू धर्म में माघ मास को बहुत ही पवित्र माना गया है।

मत्स्य पुराण, महाभारत आदि धर्म ग्रंथों मे माघ मास का महत्व विस्तार से बताया गया है।
इस मास मे भगवान माधव की पूजा करने तथा नदी स्नान करने से मनुष्य स्वर्गलोक में स्थान पाता है।

धर्मग्रंथों के अनुसार-
” स्वर्गलोके चिरं वासो येषां मनसि वर्तते।
यत्र क्वापि जले तैस्तु स्नातव्यं मृगभास्करे ! “

– अर्थात जिन मनुष्यों को चिरकाल तक स्वर्गलोक में रहने की इच्छा हो, उन्हें माघ मास में सूर्य के मकर राशि मे स्थित होने पर पवित्र नदी में प्रात:काल स्नान करना चाहिए।

” माघं तु नियतो मासमेकभक्तेन य: क्षिपेत्
श्रीमत्कुले ज्ञातिमध्ये स महत्त्वं प्रपद्यते ! “
(महाभारत अनु. 106/5)

– अर्थात जो माघमास मे नियमपूर्वक एक समय भोजन करता है, वह धनवान कुल मे जन्म लेकर अपने कुटुम्बीजनों मे महत्व को प्राप्त होता है।

” अहोरात्रेण द्वादश्यां माघमासे तु माधवम्।
राजसूयमवाप्रोति कुलं चैव समुद्धरेत् ! “
(महाभारत अनु. 109/5)

– अर्थात माघ मास की द्वादशी तिथि को दिन-रात उपवास करके भगवान माधव की पूजा करने से उपासक को राजसूययज्ञ का फल प्राप्त होता है और वह अपने कुल का उद्धार कर देता है।

‘ मासपर्यन्त स्नानासम्भवे तु त्रयहमेकाहं वा स्नायात्‌ ‘

माघ मास इतना पवित्र है कि इसमे प्रत्येक जलकुंड का जल , गंगाजल के समान पवित्र हो जाता है।
इस मास की प्रत्येक तिथि को पर्व माना जाता है।

इस महीने मे मघा नक्षत्रयुक्त पूर्णिमा होने से इसका नाम माघ पड़ा।
धार्मिक दृष्टिकोण से इस मास का बहुत अधिक महत्व है।

पद्मपुराण में बताया गया है कि अन्य मास मे जप, तप और दान से भगवान विष्णु उतने प्रसन्न नहीं होते जितने कि माघ मास मे नदी तथा तीर्थस्थलों पर स्नान करने से होते हैं।
यही कारण है कि प्राचीन पुराणों मे भगवान नारायण को पाने का सुगम मार्ग माघ मास के पुण्य स्नान को बतलाया गया है।

निर्णय सिंधु मे कहा गया है कि माघ मास के मध्य मनुष्य को कम से कम एक बार पवित्र नदी मे स्नान करना चाहिए।

जिस प्रकार माघ मास मे तीर्थ स्नान का बहुत महत्व है, उसी प्रकार दान का भी विशेष महत्व है।
इन माह में दान में तिल, गुड़ और कंबल या ऊनी वस्त्र दान देने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है।

मत्स्य पुराण के एक कथन के अनुसार माघ मास की पूर्णिमा मे जो व्यक्ति ब्राह्मण को ब्रह्मावैवर्तपुराण का दान करता है,
उसे ब्रह्म लोक की प्राप्ति होती है।

सदियों से माघ माह की विशेषता को लेकर भारत वर्ष मे नर्मदा, गंगा, यमुना, सरस्वती, कावेरी सहित कई पवित्र नदियों के तट पर माघ मेला भी लगता हैं।

माना जाता है कि माघ मास मे पवित्र नदियों में स्नान करने से एक विशेष ऊर्जा की प्राप्ति होती है।
वहीं पुराणों में वर्णित है कि इस माह मे पूजन-अर्चन व स्नान करने से नारायण को प्राप्त किया जा सकता है तथा स्वर्ग की प्राप्ति का मार्ग भी खुलता है।

माघ मास के कृष्णपक्ष की अमावस्या मौनी अमावस्या के रूप में प्रसिद्ध है। अमावस्या के दिन सोमवार का योग होने पर उस दिन देवताओं को भी दुर्लभ हो ऐसा पुण्यकाल होता है ,
क्योंकि गंगा, पुष्कर एवं दिव्य अंतरिक्ष और भूमि के जो सब तीर्थ हैं,
ये सोमवती अमावस्या के दिन जप, ध्यान, पूजन करने पर विशेष धर्मलाभ प्रदान करते हैं।

सोमवती अमावस्या, रविवारी सप्तमी, मंगलवारी चतुर्थी, बुधवारी अष्टमी ये चार तिथियां सूर्यग्रहण के बराबर कही गई हैं।
इनमे किया गया स्नान, दान व श्राद्ध अक्षय होता है।

माघ शुक्ल पंचमी अर्थात् वसंत पंचमी को सरस्वती मां का आविर्भाव-दिवस माना जाता है।
शुक्ल पक्ष की सप्तमी को अचला सप्तमी कहते हैं।
ऐसे तो माघ की प्रत्येक तिथि पुण्यपर्व है तथापि उनमे भी माघी पूर्णिमा का धार्मिक दृष्टि से बहुत महत्त्व है।
इस दिन स्नानादि से निवृत्त होकर भगवत्पूजन, श्राद्ध तथा दान का विशेष फल है।

जो इस दिन भगवान शिव की विधिपूर्वक पूजा करता है, वह अश्वमेध यज्ञ का फल पाकर भगवान विष्णु के लोक मे प्रतिष्ठित होता है।

” माघे निमग्नाः सलिले सुशीते विमुक्तपापास्त्रिदिवं प्रयांति ! “
इस माघमास मे पूर्णिमा को जो व्यक्ति धार्मिक पुस्तको का दान करता है, उसे ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है।
महाभारत के अनुशासन पर्व में वर्णन है कि माघ मास की अमावास्या को प्रयागराज मे तीन करोड़ दस हजार तीर्थों का समागम होता है।

माघ मास प्रात: स्नान सब कुछ देता है।
आयु, आरोग्य, रूप, बल, सौभाग्य, सदाचरण देता है … दरिद्रता और पाप दूर हो जाते हैं, दुर्भाग्य का नाश हो जाता है।

प्रत्येक वर्ग जाति के सनातन वैदिक धर्मावलम्बी इस महीने अपने आहार को अत्यंत सात्विक कर देते हैं।

इस प्रकार दान करने से पुण्य के साथ-साथ नर सेवा नारायण सेवा का भी उदान्त भाव समाज में फैलता है।

यदि अशक्त स्थिति के कारण पूरे महीने का नियम न निभा सके तो शास्त्रों ने यह भी व्यवस्था दी है कि तीन दिन अथवा एक दिन माघ स्नान का व्रत का पालन करें।

माघ-स्नान के लिए प्रातः तिल,जल,पुष्प,कुश लेकर संकल्प करे।
फिर निम्न प्रार्थना करें

” दुःखदारिर्द्यनाशाय श्रीविष्णोस्तोषणाय च।
प्रातःस्नानं करोम्यद्य माघे पापविनाशनम॥

मकरस्थे रवौ माघे गोविन्दाच्युत माधव।
स्नानेनानेन मे देव यथोक्तफलदो भव॥

दिवाकर जगन्नाथ प्रभाकर नमोह्यस्तुते।
परिपूर्णं कुरूष्वेदं माघस्नानं महाव्रतम॥

माघमासमिमं पुण्यं स्नाम्यहं देव माधव।
तीर्थस्यास्य जले नित्यं प्रसीद भगवन् हरे॥

माघ मास मे कड़ाके की ठंड पड़ती है और जनजीवन मे निष्क्रियता व्याप्त हो जाती है।
ऐसे मौसम मे प्रातः स्नान करने को एक धार्मिक कृत्य बनाकर हमारे मनीषियों ने सक्रिय जीवनशैली की आधारशिला रखी है।
यह एक स्वाभाविक तथ्य है कि प्रातः स्नान के पश्चात व्यक्ति निष्क्रिय होकर नहीं बैठ सकता।
माघ स्नान , शरीर को हर प्रकार के मौसम का सामना करने योग्य बनाने का उपक्रम भी है।

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